करे योग रहें निरोग-सूर्य नमस्कार, योग गुरू सुनील सिंह

सूर्य नमस्कार

हालांकि बहुत से योग गुरु सूर्य नमस्कार को भी आसन के रूप में महत्व देते हैं, लेकिन यह एक स्वतंत्र पद्धति है, इसका संबन्ध योग साधना से ही है। सूर्य का महत्व समझाने के लिये हमारे धर्म ग्रन्थों में अनादि काल से वर्णन होता आया है। आज भी सूर्य एक रहस्य है, सूर्य हमारे शरीर को ही नहीं, हमारे सूक्ष्म शरीर को भी अपने चैतन्य शक्ति से जीवंतता प्रदान करता है। सूर्य नमस्कार करने का मुख्य कारण उसके द्वारा दी जाने वाली जीवनदानयनी ऊर्जा  प्राप्त करना और उसके प्रति आभार  प्रकट करना है। सूर्य नमस्कार में 12 क्रियाएं की जाती हैं और इन 12 क्रियाओं का एक चक्र होता है। इन प्रत्येक स्थितियों का अपना एक मंत्र होता है और इन क्रियाओं का अलग-अलग लाभ होता है।

 

  1. प्रणामासन: प्रातः कालीन सूर्य की ओर मुंह करके खड़े हो जायें, दोनों भुजाओं को कोहनियों से मोड़कर प्रणाम की मुद्रा बनाएं और फिर ‘ऊं मित्राय नम: ’ का जाप करें। आपका ध्यान अनाहत चक्र पर रहेगा।
  2. हस्त उत्तानासन: पहली क्रिया के बाद लम्बी गहरी सांस भरकर दोनों हाथों को ऊपर उठाएं, कंधों की चौड़ाई के बराबर दोनों भुजाओं की दूरी रखें। सिर तथा कमर तक के भाग को पीछे की ओर झुकाएं। ‘ऊं रवये नम:’ का जाप करें। इसमें आपका ध्यान ‘विशुद्धि चक्र’ पर रहेगा।
  3. पाद हस्तासन: अब सामने की तरफ़ झुकते हुए दोनों हाथों के पंजों को पैरों के बगल में स्पर्श करते हुए रखें। माथे को घुटने से स्पर्श कराने का प्रयास करें। फिर ‘ऊं सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें। ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर होगा।
  4. अश्व संचालन आसन : इस स्थिति में अब बाएं पैर को जितना पीछे ले जा सकते हैं, ले जाएं। हाथों को दाहिने पैर के आगे रखकर गर्दन को पीछे की ओर तानें। अब ‘ऊं भानवे नमः’ मंत्र का जाप करें। इसमें हमारा ध्यान ‘आज्ञा चक्र पर होगा।
  5. पर्वतासन: इस स्थिति में दोनों हाथों को आगे के कंधों के समानान्तर सीधा भूमि पर जमाएं और फिर दोनों टांगों को पीछे की ओर तानें, एड़ियां ज़मीन पर से न उठें। नितम्बों को ऊपर जितना हो सके, ले जाएं। ‘ऊं खगाय नमः’ मंत्र का जाप करें। हमारा ध्यान विशुद्धि चक्र पर होगा।
  6. अष्टांग नमस्कारासन : इस स्थिति में घुटने मोड़ते हुए शरीर को ज़मीन की तरफ़ इस प्रकार झुकाएं कि दोनों पाद पृष्ट्ठ, दोनों घुटने, छाती, दोनों हाथों के पंजों एवं ठुड्डी ज़मीन को स्पर्श करें और हमारा नितंब व उदरप्रदेश ज़मीन से थोड़ा ऊपर रहे। ‘ऊं पूष्णे नमः’ मंत्र का जाप करें। हमारा ध्यान मणिपूर चक्र पर होगा।
  7. भुजंगासन: हाथों को सीधा करें। शरीर के अगले हिस्से – सिर, छाती और कमर के भाग को ऊपर उठाते हुए सिर तथा गर्दन को पीछे की तरफ झुकाएं। मंत्र ‘ऊं हिरण्यगर्भाय नमः’ का जाप करें। हमारा ध्यान स्वधिष्ठान चक्र पर होगा।
  8. पर्वतासन : यह स्थिति क्रमांक 5 की ही पुनरावृति है। दोनों हाथों को आगे के कंधो के समानान्तर सीधा भूमि पर जमाएं। फिर दोनों टांगों को पीछे की ओर तानिए। ध्यान रखें एड़ियां ज़मीन पर से नहीं उठें। नितम्बों को जितना ऊपर हो सके, ले जाएं। ‘ऊं मरीचये नमः’ मंत्र का जाप करें। ध्यान विशुद्धि चक्र पर हो।
  9. अश्व संचालन आसन : यह स्थिति क्रमांक 4 की आंशिक पुनरावृत्ति है। इस स्थिति मे अब दाएं पैर को जितना पीछे ले जा सकते हैं, ले जाएं। हाथों को बाईं टांग के आगे रखकर गर्दन को पीछे की ओर तानें और ‘ऊं आदित्याय नमः’ का जाप करें। ध्यान आज्ञा चक्र पर होगा।
  10. पाद हस्तासन: यह स्थिति क्रमांक 3 की पुनरावृत्ति है। सामने की ओर झुकते हुए दोनों हाथों के पंजों के पैरों के बगल में स्पर्श करते हुए रखें तथा माथे को घुटने से स्पर्श करने का प्रयास करें और मंत्र ‘ऊं सवित्राय नम:’ का जाप करें,ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर होगा।
  11. हस्त उत्तानासन : यह क्रमांक 2 की पुनरावृत्ति है। भुजाओं को कोहनियों से मोड़कर प्रणाम की मुद्रा बनाएं और फिर ‘ऊं अर्काय नमः’ का जाप करें। ध्यान विशुद्धि चक्र पर रहेगा।
  12. प्रणामासन: यह स्थिति 1 की पुनरावृत्ति है। भुजाओं को कोहनियों से मोड़कर प्रणाम की मुद्रा बनाएं और फिर ‘ऊं भास्कराय नमः’ का जाप करें। अपना ध्यान अनाहत चक्र पर लगाएं।

 

12 चक्रों का अभ्यास करें 

आध्यात्मिक लाभ के लिये इनके 12 चक्रों का अभ्यास करना चाहिये। शारीरिक तथा मानसिक लाभ के लिये 6 चक्रों से लेकर 15 चक्रों का अभ्यास करना चाहिए। नए अभ्यासी को 5 चक्रों का अभ्यास करना चाहिए। धीरे-धीरे प्रत्येक सप्ताह चक्र को बढ़ाएं।

 

इसके लाभ

  1. तन-मन को स्वस्थ रखता है।
  2. प्राण वायु शक्ति को बनाता है।
  3. पूरे शरीर का व्यायाम होता है।
  4. अजीर्ण रोगों को दूर करता है।
  5. पेट एवं आमाशय के दोषों को दूर करता है।
  6. आंखों की रौशनी बढ़ती है व बालों का झड़ना रोकता है।

 

सावधानियां 

उच्च रक्तचाप, हृदय रोगी, गर्भवती महिलाएं तथा कमर दर्द-गर्दन दर्द के रोगी इसका अभ्यास न करें।

 

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